**सरिता के लिए —.
सम्पूर्ण की अपूर्ण-सी बात**
06 Feb.'26
सुनो, सरिता—
तुम कभी-कभी बदली-बदली सी लगती हो।
कभी खामोशी ओढ़ लेती हो,
कभी व्यस्त होने का आवरण।
मन के भीतर क्या चल रहा है,
इतना तो कह दो।
अगर किसी शोर से घिरी हो,
तो उसे शब्द दे दो।
और अगर तुम्हारी बेचैनी का कारण मैं हूँ,
तो मुझे भी उस सच में शामिल कर लो।
मैं नहीं जानता
मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ
कि तुम्हें बदला हुआ देखकर
मन को अच्छा नहीं लगता।
आजकल तुम्हारे साथ बिताया गया समय
अचानक बहुत याद आने लगा है—
इतना कि वर्तमान
उसके सामने हल्का पड़ जाता है।
मैं बहुत कुछ कहना चाहता हूँ,
लेकिन हर बार
“चल छोड़” कहकर
खुद को ही रोक लेता हूँ।
पर सच कहूँ—
ये बदलाव क्यों?
अगर मुझसे जुड़ी कोई उलझन है,
तो मुझसे कहो।
सीधे कहो।
कुछ रिश्ते
सच से टूटते नहीं,
सच से ही बचते हैं।
कभी लगता है
कि भावनात्मक रूप से
मैं ही तुम पर निर्भर हो गया हूँ।
और कभी लगता है
कि मेरे आने-जाने से
तुम्हें भी फर्क पड़ता है।
तुम्हारी आदतें
अब मेरी आदतों में शामिल हैं।
तुम्हारी हँसी
मेरा दिन बना देती है,
और तुम्हारा रोना
मुझे भीतर तक हिला देता है।
मुझे पता है
मेरा शांत हो जाना
तुम्हें खलता है।
और “आज ज़्यादा काम है क्या?”
यह सवाल
अक्सर मेरी चुप्पी का
पहला दरवाज़ा बनता है।
सुबह-सुबह तुम्हारा
एक साधारण-सा “गुड मॉर्निंग”
मेरा पूरा दिन बना देता है।
और जब तुम दूर से
हाथ हिलाकर “हाय” कहती हो,
तो लगता है
किसी ने मुझे
देख लिया है।
तुम्हारे साथ कॉफी पीना,
और तुम्हारा यह जानना
कि मुझे चाय बिल्कुल पसंद नहीं—
तुम्हारी पसंद की दाल
अब मेरी भी पसंद बन चुकी है।
तुम्हारी पसंद-नापसंद
मुझे इतनी सहजता से याद है
जैसे दो का पहाड़ा।
और तुम्हें मेरी भी।
तुम्हारे साथ आना-जाना,
साथ लंच करना,
और वहाँ रुक जाना—
यह सब अब
आदत नहीं,
एक स्थायी क्रम बन चुका है।
मुझे याद है,
शुरुआत में
तुमसे बात करते हुए
मैं कितना असहज हो जाता था।
और तुम—
उस असहजता को
अपनी ज़िम्मेदारी समझकर
यह सुनिश्चित करती थीं
कि हमारे बीच
कोई न आए।
याद है वह दिन
जब तुम्हारा वही डीसी वाला सहकर्मी मिला था?
मेरे चेहरे का रंग बदल गया था।
मेरे मुँह से निकल गया था—
“ये गड़बड़ करेगा।”
और उसी डर में
मैंने तुरंत
डीसी ट्रांसफर की मेल डाल दी थी।
मुझे यह भी याद है—
तुम्हारा मुझसे
ई-मेल पढ़वाना।
कोई संदेश भेजने से पहले
AI की जगह
मुझसे पूछ लेना—
“ठीक है न?”
इंफीएम पर
टिकट उठाने के लिए
मेरा नाम लेना।
मुझे सब याद है।
लेकिन तुम्हारे आने के बाद,
धीरे-धीरे
वह जगह
मेरी नहीं रही।
उस दिन
जब तुम
अपने सीनियर से
टिकट रेज़ करवा रही थीं
और मैं वहीं था—
मुझे बहुत बुरा लगा।
क्योंकि वह सिर्फ़
एक काम नहीं था।
वह वह जगह थी
जहाँ कभी
मैं खड़ा हुआ करता था।
तुम्हारे कुछ सवाल
मेरे भीतर
बेचैनी पैदा कर देते थे।
जैसे जब तुमने
मेरी ट्रेन ट्रैक करने के लिए
डिपार्चर टाइम पूछा था—
“क्यों पूछना है?”
और मैंने कहा था—
“बस ऐसे ही।”
फिर तुमने
मुस्कुराकर
डिपार्चर, अराइवल, स्टेशन—
सब बता दिया था।
और ठीक समय पर
मेरा “हैप्पी जर्नी”
तुम तक पहुँच जाता था।
तुम भी
टिकट बुक करते समय
मुझे बता दिया करती थीं।
तुम्हारे घर का शरीफ़ा
मैं आज तक नहीं खा पाया,
लेकिन अनार
और बंदरों की वे कहानियाँ
आज भी याद हैं—
कैसे वे फल चुरा लेते थे,
और आंटी तुम्हें
धूप में तिल की रखवाली के लिए भेज देती थीं,
और वही बंदर
तुम्हें डरा देते थे।
मुझे तुम्हारे साथ
मज़ाक करना बहुत पसंद था।
जैसे उस दिन
हमने उन लड़कियों की
काली साड़ियों पर
खूब मज़ाक बनाया था।
और वह
कोयल जैसी आवाज़ वाली “मधु”—
मेरा फेवरेट टॉपिक बन गई थी।
वह हँसी
किसी पर नहीं थी,
वह हमारे बीच थी।
मुझे यह भी याद है—
मेरा तुम्हें कहना
“11:11 हो गए हैं,
विश माँग लो।”
और तुम्हारा कहना
कि तुम्हें इन पर भरोसा नहीं।
लेकिन जब मैं ध्यान नहीं देता,
तो वही बात
तुम खुद याद दिलाती थीं—
“11:11 हो रहा है,
विश माँग लो।”
मेरे लिए
वह विश नहीं थी।
वह तुमसे जुड़ने का
एक बहाना था।
तुम्हारा यह पूछना
कि “एग्ज़ाम कैसा रहा?”
और एग्ज़ाम से पहले
तुम्हारा वह लंबा-सा संदेश—
इतना पूरा
कि एग्ज़ामिनर के पास
मार्क्स काटने की भी
जगह न बचे।
मैं उन्हें पढ़कर
इतना मुस्कुराता था
कि कोई भी जल जाए—
कि इसमें ऐसा क्या है?
मुझे पता है
मैं आसान इंसान नहीं हूँ।
मैं भावनाएँ
खुलकर नहीं दिखाता।
मैं तुम्हारे खाने की
या तुम्हारी तारीफ़
अक्सर नहीं करता।
लेकिन यह भी सच है
कि तुम मेरे लिए
जो करती थीं,
मैं उन्हें
दिल से महसूस करता था।
तुम्हारा
मेरा कप धो देना,
और मेरे टोकने पर
कह देना—
“तो क्या हुआ?”
वह दिन
जब तुम
दोस्तों के साथ
पहले केक बना रही थीं
और फिर
मुझे बुलाया—
वह खास था।
केक का
एक छोटा-सा टुकड़ा
फ़र्श पर गिर जाना,
मेरा टोकना,
और तुम्हारा फिर वही कहना—
“तो क्या हुआ?”
वह क्षण
मेरे लिए
अपनापन था।
और फिर
धीरे-धीरे
कुछ बदलने लगा।
वीकेंड पर
तुमसे बात न हो पाना
मुझे बहुत खलता है।
यह मेरी कमजोरी है।
मैं आज तक
यह नहीं समझ पाया
कि जो इंसान
वीकडेज़ में
इतनी सहजता से बात करता है,
वह वीकेंड पर
एक जवाब भी
क्यों नहीं दे पाता?
क्या अड़तालीस घंटों में
एक मिनट भी
नहीं निकल पाता?
जब तुम इस बार लौटीं,
तुम पहले जैसी नहीं थीं।
और एक दिन
तुमने
मेरे बिना
अकेले जाना चुन लिया।
वहीं
मेरे पैरों तले
ज़मीन खिसक गई।
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि पहचान
माँगी नहीं जाती,
कमाई जाती है।
मैं शांत हो गया।
शायद कुछ ढूँढ रहा था।
न मिला,
तो वहीं रुक गया।
मुझे लगा
शायद
अब मेरा होना
तुम्हारे लिए भारी है।
तो मैंने
खुद को हटाने का फैसला कर लिया।
लेकिन फिर
तुम्हारा संदेश—
“समय से घर पहुँचे?”
“यहाँ बारिश हो गई है।”
और मैं
फिर से सोचने लगा।
इसलिए
मैं वह फेंका हुआ मसौदा
फिर उठा रहा हूँ।
और यह सुनिश्चित करूँगा
कि आगे से
तुम्हें मेरी वजह से
असुरक्षा न हो।
जहाँ मन को सुकून मिलने लगे,
वहाँ से दूर हो जाना
कभी-कभी सबसे आसान रास्ता होता है।
लेकिन हर दूरी
समाधान नहीं होती।
कभी-कभी
हम साथ होते हैं,
पर जुड़े नहीं होते—
जैसे मोबाइल
चार्जिंग पर लगा हो,
पर स्विच ऑन करना
भूल गए हों।
कुछ शिकायतें
रह जाने देनी चाहिए।
क्योंकि कई बार
शिकायत मिटाने की कोशिश में
हम
शिकायत करने वाले को ही
खो देते हैं।
और अक्सर—
हम ऐसा
नहीं चाहते।
— सम्पूर्ण
06 Feb.'26
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